जहां धर्म है वहां जय है
धर्म आस्था और विश्वास का नहीं, आचरण (मन, वचन और कर्म)का विषय है। मर्यादा पूर्ण(धर्मानुकूल) आचरणसे ही हम रक्षित होसकेंगे। धर्महीन मानव पशुतुल्य ही है। धर्म तो सनातन है। धर्म रक्षाकी चिन्ता में दुबला हुआजारहा बहुत बड़ा धन-जीवी वर्ग सचमें स्व–रक्षाके लिए चिन्तित है, भयभीत है।
धर्म कोई मजहब नहीं, जो उसका बलसे विस्तार या विनाश कियाजासकता हो।
धर्म को जीवन में स्थानदें, । दैवीय शक्तिकी साधन करें।
धर्म स्वयं में बल है, शक्ति है, ऊर्जा है, प्रकाश है।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥ धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः । तस्माद् धर्मं न त्यजामि मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
रक्षित धर्म, रक्षक की रक्षा करता है"
जहां सत्य है वहां धर्म है और जहां धर्म है वहां जय है।
—भोलेश प्रसाद वशिष्ठ

अति उत्तम। विचार उत्तम हैं।
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