शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2024



 क्षौरकर्म (बाल बनाना) विषयक शास्त्रविचार


पहले दाढ़ी दाहिनी ओरसे पूरी बनवा ले, 
फिर मूंछको 
तब बगलके बाल 
तथा सिरके केशको और 
इसके बाद आवश्यकतानुसार अन्य रोमों को कटवाना चाहिये। अन्तमें नखोंके कटवानेका विधान है।

१.शमश्रूण्यग्रे वापयतेsथोपकक्षावथ केशानथ लोमान्यथनखानि (गृह्यसत्र)
२.अर्थतन्मनु्वप्र मिथुनमपश्यत् । स श्मश्रूण्यग्रेऽवपत् ।अथोपकक्षौ अथ केशान् ।(तैतिरीय ब्राह्मण)

एकादशी, 
चतुर्दशी, 
अमावास्या, 
पूर्णिमा , 
संक्रान्ति, 
व्यतिपात,
विष्टि (भद्रा), 
व्रतके दिन, 
श्राद्धके दिन 
एवं मंगल, शनिवारको क्षौरकर्म वर्जित है।

   क्षौरकर्ममें गर्गादि मुनियोंका कथन है कि— 
रविवारको क्षौरकरानेसे एक मासकी, 
शनिवारको सात मासकी 
और भौमवार (मंगल वार) को आठ मासकी 
आयुको, उस-उस दिनके अभिमानी देवता क्षीण कर देते हैं । 
   इसी प्रकार 
बुधवारको क्षौर करानेसे पाँच मासकी, 
सोमवारको सात मासकी, 
गुरुवारको दस मासकी 
और शुक्रवारको ग्यारह मासकी 
आयुकी, उस-उस. दिनके अभिमानी देवता वृद्धि करते हैं ।
   पुत्रेच्छु गृहस्थों एवं एकपुत्रवालेको सोमवारको तथा विद्या एवं लक्ष्मीके इच्छुकको गुरुवारको क्षौर नहीं कराना चाहिये।

सोमवार, 16 सितंबर 2024

तर्पण(TARPAN)


 

थल पर तर्पण

जल में तर्पण

तर्पण:
१. देव ऋषि तर्पण
२. दिव्य मनुष्य तर्पण
३. पितृ तर्पण
 
कुश (डाभ): त्रिकुश 
पवित्री: कुश की बनी दो अंगूठी
जनेऊ: उपवीत(सव्य), निवीत (कंठी), प्राचीनावीत(अपसव्य)

 

  देव और ऋषि तर्पणके समय 

*
दिव्य मनुष्य तर्पण के समय 
कण्ठ पर मालाकी तरह
*


पितृ तर्पणके समय 

विशेष: जिसके पिता जीवित हैं वह  यज्ञोपवीत को बाईं भुजाके अन्दर नहीं ले।

गमछा
अक्षत(साबुत चावल)
काले तिल

विशेष: जिसके पिता जीवित हैं उसके द्वारा तिल तर्पण का निषेध है।(अग्निपुराण)

यव (जौ)
दो पात्र(मिट्टी और लोहेके पात्रका निषेध)
पुष्प
चंदन
जल

 कुश के भाग: मूल–मध्य–अग्र
 हाथौंके स्थान: ब्रह्म तीर्थ, काय तीर्थ, देव तीर्थ, पितृ तीर्थ और अग्नि तीर्थ।


तीर्थ–स्थल

दिशा: पूर्व, उत्तर और दक्षिण।
देव, ऋषि तर्पण—
पूर्व दिशा की ओर, 
जनेऊ सव्य, 
गमछा दाएं कंधे पर, 
हाथ में त्रिकुश अग्राग्र देव तीर्थ पर रख ऋषियोंको चावल युक्त जलकी एक एक अंजलि।
दिव्य मनुष्य तर्पण—
 उत्तर दिशा की ओर, 
जनेऊ निवित, 
गमछा गर्दन पर, 
हाथ में त्रिकुश मोड़कर मध्य भाग कायतीर्थ से लगाकर दिव्य मनुष्यों को यव(जौ) युक्त जल की दो दो अंजलि।
पितृ तर्पण—
पश्चिम दिशा की ओर, 
जनेऊ अपसव्य, 
गमछा बांए कंधे पर, 
हाथ में त्रिकुश मोड़कर मूल और अग्र को पितृ तीर्थ पर रख पितरों को काले तिल युक्त जलकी तीन तीन अंजलि।


(नदी, ताल में जलमें खड़े होकर, भूमि पर पात्र से पत्र में।)
देव ?:  

पूर्व दिशा में—

ब्रह्मा तृप्यताम् ।

ॐ विष्णु्तृप्यताम्। 

ॐ रुद्रस्तृप्यताम् । 

ॐप्रजापतिस्तृप्यताम्। 

ॐ देवास्तृप्यन्ताम् । 

ॐ छन्दांसि तृप्यन्ताम । 

ॐवेदास्तृप्यन्ताम् । 

ॐ ऋषयस्तृप्यन्ताम्। 

ॐ पुराणाचार्यास्तृप्यन्ताम् । 

ॐगन्धर्वास्तृप्यन्ताम्। 

ॐ इतराचार्यास्तृप्यन्ताम्। 

ॐ संवत्सरःसावयवस्तृप्यताम्। 

ॐ देव्यस्तृप्यन्ताम्। 

ॐ अप्सरसस्तृप्यन्ताम् । 

ॐदेवानुगास्तृप्यन्ताम्। 

ॐ नागास्तृप्यन्ताम्। 

ॐ सागरास्तृप्यन्ताम् । 

ॐपर्वतास्तृप्यन्ताम्। 

ॐ सरितस्तृप्यन्ताम् । 

ॐ मनुष्यास्त्प्यन्ताम्।

ॐ यक्षास्तृप्यन्ताम्। 

ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम्। 

ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम्। 

ॐसुपर्णास्तृप्यन्ताम् । 

ॐ भूतानि तृप्यन्ताम। 

ॐ पशवस्तृप्यन्ताम्। 

ॐवनस्पतयस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ ओषधयस्तृप्यन्ताम् । 

ॐ भूतग्रामश्चतु्विध-स्तृप्यताम्।

 



बुधवार, 21 अगस्त 2024

 

  "साक्षात् धर्म"

जहां धर्म है वहां जय है

धर्म आस्था और विश्वास का नहीं, आचरण (मन, वचन और कर्म)का विषय है। मर्यादा पूर्ण(धर्मानुकूल) आचरणसे ही हम रक्षित होसकेंगे।        धर्महीन मानव पशुतुल्य ही है। धर्म तो सनातन है। धर्म रक्षाकी  चिन्ता में दुबला हुआजारहा बहुत बड़ा धन-जीवी वर्ग सचमें स्व–रक्षाके लिए चिन्तित है, भयभीत है। 

धर्म कोई मजहब नहीं, जो उसका बलसे विस्तार या विनाश कियाजासकता हो।

धर्म को जीवन में स्थानदें,   । दैवीय शक्तिकी साधन करें। 

धर्म स्वयं में बल है, शक्ति है, ऊर्जा है, प्रकाश है। 

 तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥ धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ⁠। तस्माद् धर्मं न त्यजामि मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ⁠॥

रक्षित धर्म, रक्षक की रक्षा करता है"

जहां सत्य है वहां धर्म है और जहां धर्म है वहां जय है।

                                           —भोलेश प्रसाद वशिष्ठ 

  क्षौरकर्म (बाल बनाना) विषयक शास्त्रविचार पहले दाढ़ी दाहिनी ओरसे पूरी बनवा ले,  फिर मूंछको  तब बगलके बाल  तथा सिरके केशको और  इसके बाद आवश्...