गुरुवार, 27 अगस्त 2026

          धर्म साध्य ,  साधन नहीं। 
         
गंतव्य   है ,  पंथ   नहीं 
हरि ओम!
  "धर्म” को अज्ञानतावस अक्सर "रिलीजन" या "मज़हब" समझ  जाता है, लेकिन इसका वास्तविक अर्थ इससे कहीं बड़ा और विशुद्ध और पृथक है। 

'धर्म', एक शाश्वत सत्य है जो 'सनातन' है।

अक्सर जब हम 'धर्म' शब्द सुनते हैं, तो हमारे मन में एक उपासना पद्धति  उभरने लगती है। हम इसका अनुवाद अंग्रेजी के ‘रिलीजन' या उर्दू के 'मज़हब' से कर देते हैं। लेकिन क्या  'धर्म'  सच में महज़ एक उपासना या पूजा पद्धति है? अगर हम इसकी विशुद्धि और तात्विक व्याख्या करें, तो   गुण और कर्म को व्यक्त करने वाले'धर्म' शब्द की नित्यता का सूचक है ‘सनातन’ शब्द ।

सनातन कोई मत, पंथ या संप्रदाय नहीं है। यह तो मात्र आदि अंत रहित शाश्वत काल सूचक शब्द है । इस ब्रह्माण्ड के अंत के बाद भी रहेगा।

'सनातन' और 'धर्म' का विशुद्ध अर्थ

सनातन का अर्थ: जो सदा से है, जिसका ना कोई आदि है और ना कोई अंत। जो समय, स्थान और व्यक्ति की सीमा से परे है।

धर्म का अर्थ: ये संस्कृत के 'धृ' (धृ) धातु से बना है, जिसका अर्थ है 'धारण करने योग्य'। जो सृष्टि के संचालन को बनाए रखता है, वही गुण और कर्म धर्म है।

अग्निहोत्र का धर्म है प्रकाश और तप देना। पानी का धर्म है शीतलता और प्यास बुझाना। ठीक वैसा ही, मनुष्य का धर्म किसी विशेष पुस्तक या व्यक्ति को मनाना नहीं, बाल्की अपने भीतर के सत्य, करुणा और कर्तव्य को धारण करना है।

'धर्म' और "रिलीजन" या "मज़हब" में भेद क्या है?

अंग्रेजी का शब्द 'रिलीजन' या 'आस्था' एक निश्चित विश्वास सिद्धांत पर आधारित होता है। किसी भी "रिलीजन" या "मज़हब" के लिए तीन चीज़ें अनिवार्य हैं:

एक निश्चिंत पैगंबर या संस्थापक (मूल पुरुष)

एक निश्चित  पुस्तक (जिसे पवित्र मानते हैं)

एक निश्चित इतिहास (ऐतिहासिक समयरेखा)

  धर्म का कोई एक अकेला संस्थापक (संस्थापक) नहीं है। ये किसी एक पुस्तक के नियम तक सीमित नहीं है। ये कोई निश्चित तारीख या वर्ष में शुरू नहीं हुआ। ये तो सृष्टि का विश्वव्यापि नियम (ब्रह्मांडीय कानून) है। एक व्यक्ति ईश्वर को माने या ना माने, अगर वह नैतिक है, प्रेम और कर्तव्य के साथ सद्गुण वृत्ति का पोषक है, तो वह सनातन के नियम का ही पालन कर रहा है।

धर्म के मूल सिद्धांत:

विशुद्ध धर्म  किसी पूजा पद्धति का बंधक नहीं है, बल्कि इसके कुछ सर्वग्राही सार्वभौमिक  नियम  हैं:
  
सनातन धर्म और शास्त्रों (विशेषकर मनुस्मृति और महाभारत) के अनुसार धर्म के 10 मुख्य लक्षण निम्नलिखित श्लोक में बताए गए हैं:

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम्॥


धर्म के 10लक्षणों का सरल अर्थ इस्प्रकार है—

धृति (धैर्य): सुख-दुःख, लाभ-हानि या हर परिस्थिति में मन को स्थिर और धैर्यवान रखना। 

क्षमा (क्षमाशीलता): दूसरों के अपराध करने या बुरा चाहने पर भी मन में द्वेष न रखकर क्षमा कर देना। 

दम (मन का संयम): अपने मन और विचारों को बुरे रास्तों से हटाकर अच्छे और नेक कार्यों में लगाना। 

अस्तेय (चोरी न करना): किसी भी प्रकार से दूसरे की वस्तु या धन को अन्याय से न लेना। 

शौच (पवित्रता): शरीर की बाहरी स्वच्छता के साथ-साथ मन और विचारों की आंतरिक पवित्रता बनाए रखना। 

इंद्रियनिग्रह (इंद्रियों पर नियंत्रण): अपनी सभी ज्ञान और कर्म इंद्रियों को गलत आदतों व विषयों से वश में रखना। 

धी (बुद्धि/विवेक): सही और गलत, या धर्म और अधर्म को समझने की विवेकशील बुद्धि रखना। 

विद्या (ज्ञान): सत्य और यथार्थ का ज्ञान प्राप्त करना तथा अज्ञानता को दूर करना। 

सत्य (सत्यवादिता): हमेशा सच बोलना और सत्य के मार्ग पर आचरण करना। 

अक्रोध (क्रोध न करना): मन में गुस्सा या क्रोध न लाना और शांति बनाए रखना। 
धर्म साध्य है, साधन नहीं:
 पूजा, उपासना पद्धति, मत, पंथ, संप्रदाय, "रिलीजन" या "मज़हब" की नियमावली तो साधन मात्र हैं यदि उनकी शिक्षा, तालीम,  क्रियाकलाप  "धर्म” पोषक हों।    

वसुधैव कुटुंबकम: पूरी धरती ही मेरा परिवार है। ये विचार किसी "रिलीजन" या "मज़हब" की  उपज नही, इसके लिए  "धर्म” विस्तार चाहिए।

कर्म का सिद्धांत: आप जो बोएंगे, वही काटेंगे। ये एक वैज्ञानिक नियम है जो हर जीव पर समरूप से लागू होता है।

एकम सत् विप्रा बहुधा वदन्ति:  एक ही सत्य को, विशिष्ट ज्ञानी जन अलग-अलग रूप बोलते हैं।
   धर्म हर   फिलॉस्फी, रिलीजन और थॉट्स की कसौटी है।  

निष्कर्ष:

  धर्म किसी रिलीजन, मजहब  की पहचान का बंधक  नहीं है। ये मानव चेतना के विकास का विशुद्ध विज्ञान है। ये आत्म-शोधन का मार्ग है। जब हम इसे रिलीजन या मजहब' के चश्मे से देखना बंद करते हैं, तब हमें इसकी विशुद्धता और विराट रूप का भान होता है। धर्म का हेतु है—अपने भीतर के शाश्वत सत्य का साक्षात्कार करना, जो कभी नहीं मरता।

 

सोमवार, 17 अगस्त 2026

धर्म (DHARM)


 

                         धर्म ?  

स्वागत है आपका हमारे  ब्लॉग ‘धर्म’ नाम पर। यह ब्लॉग जीवन के गहरे सत्यों, नैतिक मूल्यों और अध्यात्म की सरल और सच्ची बातें साझा करने का एक छोटा सा प्रयास है।
धर्म का असली अर्थ क्या है?
अक्सर हम पूजा-पाठ, रीति-रिवाजों या किसी खास परंपरा को धर्म मानलेते हैं। सच में वे सभी साधन मात्र हैं।   अगर गहराई से सोचें तो धर्म का अर्थ है— मनुजता का विकाश करते हुए आत्मोत्थानके  सही मार्ग पर चलना। यही हमारे अंदर की दैवीय संपदाओं का विकास करते हुए जोड़ना सिखाता है। यही धर्म  है।
इस ब्लॉग पर आपको क्या मिलेगा?
हम इस मंच के जरिए आपके साथ ये बातें साझा करेंगे:
  • जीवन जीने के नैतिक और सरल तरीके
  • प्राचीन ज्ञान और आधुनिक जीवन का मेल
  • मन की शांति और सकारात्मकता के उपाय
  • आपके सवाल और उनके विचारशील उत्तर


शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2024

क्षौर–कर्म



 क्षौरकर्म (बाल बनाना) विषयक शास्त्रविचार


पहले दाढ़ी दाहिनी ओरसे पूरी बनवा ले, 
फिर मूंछको 
तब बगलके बाल 
तथा सिरके केशको और 
इसके बाद आवश्यकतानुसार अन्य रोमों को कटवाना चाहिये। अन्तमें नखोंके कटवानेका विधान है।

१.शमश्रूण्यग्रे वापयतेsथोपकक्षावथ केशानथ लोमान्यथनखानि (गृह्यसत्र)
२.अर्थतन्मनु्वप्र मिथुनमपश्यत् । स श्मश्रूण्यग्रेऽवपत् ।अथोपकक्षौ अथ केशान् ।(तैतिरीय ब्राह्मण)

एकादशी, 
चतुर्दशी, 
अमावास्या, 
पूर्णिमा , 
संक्रान्ति, 
व्यतिपात,
विष्टि (भद्रा), 
व्रतके दिन, 
श्राद्धके दिन 
एवं मंगल, शनिवारको क्षौरकर्म वर्जित है।

   क्षौरकर्ममें गर्गादि मुनियोंका कथन है कि— 
रविवारको क्षौरकरानेसे एक मासकी, 
शनिवारको सात मासकी 
और भौमवार (मंगल वार) को आठ मासकी 
आयुको, उस-उस दिनके अभिमानी देवता क्षीण कर देते हैं । 
   इसी प्रकार 
बुधवारको क्षौर करानेसे पाँच मासकी, 
सोमवारको सात मासकी, 
गुरुवारको दस मासकी 
और शुक्रवारको ग्यारह मासकी 
आयुकी, उस-उस. दिनके अभिमानी देवता वृद्धि करते हैं ।
   पुत्रेच्छु गृहस्थों एवं एकपुत्रवालेको सोमवारको तथा विद्या एवं लक्ष्मीके इच्छुकको गुरुवारको क्षौर नहीं कराना चाहिये।

बुधवार, 21 अगस्त 2024

धर्म (DHARM)

 

  "साक्षात् धर्म"

जहां धर्म है वहां जय है

धर्म आस्था और विश्वास का नहीं, आचरण (मन, वचन और कर्म)का विषय है। मर्यादा पूर्ण(धर्मानुकूल) आचरणसे ही हम रक्षित होसकेंगे।        धर्महीन मानव पशुतुल्य ही है। धर्म तो सनातन है। धर्म रक्षाकी  चिन्ता में दुबला हुआजारहा बहुत बड़ा धन-जीवी वर्ग सचमें स्व–रक्षणके लिए चिन्तित है, भयभीत है। 

धर्म कोई मजहब नहीं, जो उसका बलसे विस्तार या विनाश कियाजासकता हो।

धर्म को जीवन में स्थानदें,   । दैवीय शक्तिकी साधन करें। 

धर्म स्वयं में बल है, शक्ति है, ऊर्जा है, प्रकाश है। 

 तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥ धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ⁠। तस्माद् धर्मं न त्यजामि मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ⁠॥

रक्षित धर्म, रक्षक की रक्षा करता है"

जहां सत्य है वहां धर्म है और जहां धर्म है वहां जय है।

                      —भोलेश प्रसाद वशिष्ठ