सोमवार, 17 अगस्त 2026

धर्म (DHARM)


 

                         धर्म ?  

स्वागत है आपका हमारे  ब्लॉग ‘धर्म’ नाम पर। यह ब्लॉग जीवन के गहरे सत्यों, नैतिक मूल्यों और अध्यात्म की सरल और सच्ची बातें साझा करने का एक छोटा सा प्रयास है।
धर्म का असली अर्थ क्या है?
अक्सर हम पूजा-पाठ, रीति-रिवाजों या किसी खास परंपरा को धर्म मानलेते हैं। सच में वे सभी साधन मात्र हैं।   अगर गहराई से सोचें तो धर्म का अर्थ है— मनुजता का विकाश करते हुए आत्मोत्थानके  सही मार्ग पर चलना। यही हमारे अंदर की दैवीय संपदाओं का विकास करते हुए जोड़ना सिखाता है। यही धर्म  है।
इस ब्लॉग पर आपको क्या मिलेगा?
हम इस मंच के जरिए आपके साथ ये बातें साझा करेंगे:
  • जीवन जीने के नैतिक और सरल तरीके
  • प्राचीन ज्ञान और आधुनिक जीवन का मेल
  • मन की शांति और सकारात्मकता के उपाय
  • आपके सवाल और उनके विचारशील उत्तर


शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2024

क्षौर–कर्म



 क्षौरकर्म (बाल बनाना) विषयक शास्त्रविचार


पहले दाढ़ी दाहिनी ओरसे पूरी बनवा ले, 
फिर मूंछको 
तब बगलके बाल 
तथा सिरके केशको और 
इसके बाद आवश्यकतानुसार अन्य रोमों को कटवाना चाहिये। अन्तमें नखोंके कटवानेका विधान है।

१.शमश्रूण्यग्रे वापयतेsथोपकक्षावथ केशानथ लोमान्यथनखानि (गृह्यसत्र)
२.अर्थतन्मनु्वप्र मिथुनमपश्यत् । स श्मश्रूण्यग्रेऽवपत् ।अथोपकक्षौ अथ केशान् ।(तैतिरीय ब्राह्मण)

एकादशी, 
चतुर्दशी, 
अमावास्या, 
पूर्णिमा , 
संक्रान्ति, 
व्यतिपात,
विष्टि (भद्रा), 
व्रतके दिन, 
श्राद्धके दिन 
एवं मंगल, शनिवारको क्षौरकर्म वर्जित है।

   क्षौरकर्ममें गर्गादि मुनियोंका कथन है कि— 
रविवारको क्षौरकरानेसे एक मासकी, 
शनिवारको सात मासकी 
और भौमवार (मंगल वार) को आठ मासकी 
आयुको, उस-उस दिनके अभिमानी देवता क्षीण कर देते हैं । 
   इसी प्रकार 
बुधवारको क्षौर करानेसे पाँच मासकी, 
सोमवारको सात मासकी, 
गुरुवारको दस मासकी 
और शुक्रवारको ग्यारह मासकी 
आयुकी, उस-उस. दिनके अभिमानी देवता वृद्धि करते हैं ।
   पुत्रेच्छु गृहस्थों एवं एकपुत्रवालेको सोमवारको तथा विद्या एवं लक्ष्मीके इच्छुकको गुरुवारको क्षौर नहीं कराना चाहिये।

बुधवार, 21 अगस्त 2024

धर्म (DHARM)

 

  "साक्षात् धर्म"

जहां धर्म है वहां जय है

धर्म आस्था और विश्वास का नहीं, आचरण (मन, वचन और कर्म)का विषय है। मर्यादा पूर्ण(धर्मानुकूल) आचरणसे ही हम रक्षित होसकेंगे।        धर्महीन मानव पशुतुल्य ही है। धर्म तो सनातन है। धर्म रक्षाकी  चिन्ता में दुबला हुआजारहा बहुत बड़ा धन-जीवी वर्ग सचमें स्व–रक्षणके लिए चिन्तित है, भयभीत है। 

धर्म कोई मजहब नहीं, जो उसका बलसे विस्तार या विनाश कियाजासकता हो।

धर्म को जीवन में स्थानदें,   । दैवीय शक्तिकी साधन करें। 

धर्म स्वयं में बल है, शक्ति है, ऊर्जा है, प्रकाश है। 

 तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥ धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ⁠। तस्माद् धर्मं न त्यजामि मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ⁠॥

रक्षित धर्म, रक्षक की रक्षा करता है"

जहां सत्य है वहां धर्म है और जहां धर्म है वहां जय है।

                      —भोलेश प्रसाद वशिष्ठ